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जोश मलीहाबादी

1898 - 1982 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

सबसे गर्म मिज़ाज प्रगतिशील शायर जिन्हें शायर-ए-इंकि़लाब (क्रांति-कवि) कहा जाता है

सबसे गर्म मिज़ाज प्रगतिशील शायर जिन्हें शायर-ए-इंकि़लाब (क्रांति-कवि) कहा जाता है

जोश मलीहाबादी

ग़ज़ल 46

शेर 42

आड़े आया कोई मुश्किल में

मशवरे दे के हट गए अहबाब

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इस दिल में तिरे हुस्न की वो जल्वागरी है

जो देखे है कहता है कि शीशे में परी है

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गुज़र रहा है इधर से तो मुस्कुराता जा

चराग़-ए-मज्लिस-ए-रुहानियाँ जलाता जा

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महफ़िल-ए-इश्क़ में वो नाज़िश-ए-दौराँ आया

गदा ख़्वाब से बेदार कि सुल्ताँ आया

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शबाब-ए-रफ़्ता के क़दम की चाप सुन रहा हूँ मैं

नदीम अहद-ए-शौक़ की सुनाए जा कहानियाँ

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मर्सिया 2

 

क़ितआ 2

 

रुबाई 35

क़िस्सा 18

पुस्तकें 295

Aatish Kadah

 

 

आज़ादी की कहानी और आज़ादी की ज़बानी

 

1958

Arsh-o-Farsh

 

1973

अर्श-ओ-फ़र्श

 

1944

Awaza-e-Haq

 

1921

Ayaat-o-Naghmat

 

1944

आयात-ओ-नग़्मात

 

1941

Deewan-e-Josh

 

 

फ़िक्र-ओ-निशात

 

1969

Fikr-o-Nishat

 

1937

चित्र शायरी 10

हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी और उन की तरफ़ ख़ुदाई है

इंसान के लहू को पियो इज़्न-ए-आम है अंगूर की शराब का पीना हराम है

एक दिन कह लीजिए जो कुछ है दिल में आप के एक दिन सुन लीजिए जो कुछ हमारे दिल में है

एक दिन कह लीजिए जो कुछ है दिल में आप के एक दिन सुन लीजिए जो कुछ हमारे दिल में है

हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी और उन की तरफ़ ख़ुदाई है

मेरे रोने का जिस में क़िस्सा है उम्र का बेहतरीन हिस्सा है

हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी और उन की तरफ़ ख़ुदाई है

 

वीडियो 41

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी

Bol ek tare jhan jhan jhan jhan

जोश मलीहाबादी

Josh Malihabadi Marsia Rubaai

जोश मलीहाबादी

Josh reading a Marsiya

जोश मलीहाबादी

Marsiya - Mojid O Mufakkir

जोश मलीहाबादी

Rubayi reading by Josh

जोश मलीहाबादी

Shayaron ka manshoor (nazm)

जोश मलीहाबादी

Takhleeqe Bengal

जोश मलीहाबादी

अज़मत-ए-इंसान

जोश मलीहाबादी

अपनी मल्का-ए-सुख़न से

ऐ शम-ए-'जोश' ओ मशअ'ल-ए-ऐवान-ए-आरज़ू जोश मलीहाबादी

क्या गुल-बदनी है

किस दर्जा फ़ुसूँ-कार वो अल्लाह ग़नी है जोश मलीहाबादी

रिश्वत

लोग हम से रोज़ कहते हैं ये आदत छोड़िए जोश मलीहाबादी

ऑडियो 8

क़दम इंसाँ का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है

गुदाज़-ए-दिल से बातिन का तजल्ली-ज़ार हो जाना

ज़ालिम ये ख़मोशी बेजा है इक़रार नहीं इंकार तो हो

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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