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शहराम सर्मदी

1975 | तजाकिस्तान

शहराम सर्मदी

ग़ज़ल 26

नज़्म 23

अशआर 3

ब-नाम-ए-इश्क़ इक एहसान सा अभी तक है

वो सादा-लौह हमें चाहता अभी तक है

मिरे अलावा सभी लोग अब ये मानते हैं

ग़लत नहीं थी मिरी राय उस के बारे में

फ़क़त ज़मान मकाँ में ज़रा सा फ़र्क़ आया

जो एक मसअला-ए-दर्द था अभी तक है

 

पुस्तकें 2

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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