Sheikh Ibrahim Zauq's Photo'

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

1790 - 1854 | दिल्ली, भारत

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और राजकवि , मिर्ज़ा ग़ालिब से उनकी प्रतिद्वंदिता प्रसिद्ध है।

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और राजकवि , मिर्ज़ा ग़ालिब से उनकी प्रतिद्वंदिता प्रसिद्ध है।

ग़ज़ल 61

शेर 70

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

a single tear caused my fall in her company

just a drop of water drowned my dignity

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अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

मर के भी चैन पाया तो किधर जाएँगे

being agitated I express the hope to die, although

in death, if solace is not found, then where shall I go?

'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर

आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता

save trouble, in formality, zauq nothing else can be

at ease he then remains he who, eschews formality

क़ितआ 4

 

पुस्तकें 57

दीवान-ए-ज़ौक़

 

1980

Deewan-e-Zauq

 

 

Deewan-e-Zauq

 

1859

दीवान-ए-ज़ौक़

 

1907

दीवान-ए-ज़ौक़

 

1898

Deewan-e-Zauq

 

 

Deewan-e-Zauq

 

 

Deewan-e-Zauq

 

1932

दीवान-ए-ज़ाैक़

 

 

Deewan-e-Zauq

 

 

चित्र शायरी 15

तू भला है तो बुरा हो नहीं सकता ऐ 'ज़ौक़' है बुरा वो ही कि जो तुझ को बुरा जानता है और अगर तू ही बुरा है तो वो सच कहता है क्यूँ बुरा कहने से तू उस के बुरा मानता है

क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता

वीडियो 14

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लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

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लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

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लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

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लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

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लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

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ऑडियो 14

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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