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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
पुख़्ता हो जाए तू है शमशेर-ए-बे-ज़िन्हार तू
हो सदाक़त के लिए जिस दिल में मरने की तड़प
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
शम् ओ परवाना न महफ़िल में हों बाहम ज़िन्हार
शम्अ'-रू ने मुझे भेजे हैं ये परवाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
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नज़्म
रोटियाँ
ये रंडियाँ जो नाचे हैं घूँघट को मुँह पे ले
घूँघट न जानो दोस्तो तुम ज़ीनहार उसे
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
बिस कि हैरत से ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-ज़िन्हार है
नाख़ुन-ए-अंगुश्त-ए-बुत ख़ाल-ए-लब-ए-बीमार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ये तर्ज़-ए-तरन्नुम कहीं ज़िन्हार न ढूँडो
ऐ 'शेफ़्ता' या मुर्ग़-ए-चमन रखते हैं या हम
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
हास्य
यानी इक काला न जिस गोरे के मुक्के से मरे
कर नहीं सकता हुकूमत हिन्द पर वो ज़ीनहार














