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ज़ेब ग़ौरी

1928 - 1985 | कानपुर, भारत

भारत में अग्रणी आधुनिक शायरों में विख्यात।

भारत में अग्रणी आधुनिक शायरों में विख्यात।

ग़ज़ल 61

शेर 58

ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला

मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ

अधूरी छोड़ के तस्वीर मर गया वो 'ज़ेब'

कोई भी रंग मयस्सर था लहू के सिवा

जितना देखो उसे थकती नहीं आँखें वर्ना

ख़त्म हो जाता है हर हुस्न कहानी की तरह

पुस्तकें 3

Chak

 

1985

Zard Zarkhez

 

1976

Shumara Number-008,009

1985

 

ऑडियो 43

अक्स-ए-फ़लक पर आईना है रौशन आब ज़ख़ीरों का

अक्स-ए-फ़लक पर आईना है रौशन आब ज़ख़ीरों का

कब तलक ये शाला-ए-बे-रंग मंज़र देखिए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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