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स्वतंत्रता दिवस पर शेर

देशभक्ति एक महान और ख़ूबसूरत भावना है। शाइरी में इस भावना को अनेक रूपों में प्रस्तुत किया गया है। शाइरों ने इसके कुछ ऐसे पहलुओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिन पर हम हमेशा ध्यान नहीं देते। इन अशआर में आप इस भावना की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ देख सकते हैं।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

Interpretation: Rekhta AI

अल्लामा इक़बाल इस शेर में कहते हैं कि धर्म का संदेश आपसी नफरत नहीं है। वे याद दिलाते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पहचान साझा देश है, इसलिए मिलकर सम्मान से रहना चाहिए। भाव-केन्द्र एकता, भाईचारे और सहिष्णुता की पुकार है।

अल्लामा इक़बाल

मिट्टी की मोहब्बत में हम आशुफ़्ता-सरों ने

वो क़र्ज़ उतारे हैं कि वाजिब भी नहीं थे

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दिल से निकलेगी मर कर भी वतन की उल्फ़त

मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी

लाल चन्द फ़लक

वतन की रेत ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे

मुझे यक़ीं है कि पानी यहीं से निकलेगा

मुज़फ़्फ़र वारसी

लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है

उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी

Interpretation: Rekhta AI

फ़िराक़ गोरखपुरी ने शहीदों के बलिदान को आज़ादी की असली कीमत और पहचान के रूप में दिखाया है। “रंग लाया” का अर्थ है कि त्याग का फल मिला और सच सामने आया। “नाम-ए-आज़ादी” को ऐसी आवाज़ की तरह रखा गया है जो समय में उछलकर फैलती है। भाव में गौरव के साथ उन कुर्बानियों के प्रति श्रद्धा भी है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

वतन के जाँ-निसार हैं वतन के काम आएँगे

हम इस ज़मीं को एक रोज़ आसमाँ बनाएँगे

जाफ़र मलीहाबादी

दिलों में हुब्ब-ए-वतन है अगर तो एक रहो

निखारना ये चमन है अगर तो एक रहो

जाफ़र मलीहाबादी

वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है

मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में

चकबस्त बृज नारायण

उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता

जिस मुल्क की सरहद की निगहबान हैं आँखें

अज्ञात

वतन की पासबानी जान-ओ-ईमाँ से भी अफ़ज़ल है

मैं अपने मुल्क की ख़ातिर कफ़न भी साथ रखता हूँ

अज्ञात

अहल-ए-वतन शाम-ओ-सहर जागते रहना

अग़्यार हैं आमादा-ए-शर जागते रहना

जाफ़र मलीहाबादी

हम अहल-ए-क़फ़स तन्हा भी नहीं हर रोज़ नसीम-ए-सुब्ह-ए-वतन

यादों से मोअत्तर आती है अश्कों से मुनव्वर जाती है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में वक्ता अपने देश के माहौल को जन्नत के समान बताता है, जैसे वहीं रहना सच्ची शांति और खुशी हो। “मेरा वतन वही है” की दोहराई हुई बात दृढ़ निश्चय और गहरे लगाव को दिखाती है। भाव यह है कि देश केवल जमीन नहीं, बल्कि जीवन और पहचान का पवित्र सहारा है।

अल्लामा इक़बाल

ख़ूँ शहीदान-ए-वतन का रंग ला कर ही रहा

आज ये जन्नत-निशाँ हिन्दोस्ताँ आज़ाद है

अमीन सलौनवी

वतन जब भी सर-ए-दश्त कोई फूल खिला

देख कर तेरे शहीदों की निशानी रोया

जाफ़र ताहिर

है मोहब्बत इस वतन से अपनी मिट्टी से हमें

इस लिए अपना करेंगे जान-ओ-तन क़ुर्बान हम

अज्ञात

होगा राएगाँ ख़ून-ए-शहीदान-ए-वतन हरगिज़

यही सुर्ख़ी बनेगी एक दिन उनवान-आज़ादी

नाज़िश प्रतापगढ़ी

क्या करिश्मा है मिरे जज़्बा-ए-आज़ादी का

थी जो दीवार कभी अब है वो दर की सूरत

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

पूछो हम-सफ़रो मुझ से माजरा-ए-वतन

वतन है मुझ पे फ़िदा और मैं फ़िदा-ए-वतन

मर्दान अली खां राना

ख़ाक-ए-वतन अब तो वफ़ाओं का सिला दे

मैं टूटती साँसों की फ़सीलों पे खड़ा हूँ

जावेद अकरम फ़ारूक़ी

वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी

वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी

मख़दूम मुहिउद्दीन

कारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी की

क़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलाम

बनो ताहिरा सईद

तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर

राह-ए-वतन पर अपनी जानें लड़ाए जाओ

लाल चन्द फ़लक

अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा बर्ग समर जाना

ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना

चकबस्त बृज नारायण
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