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अहमद सलमान

1964 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 5

सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था

माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था

कुचल कुचल के फ़ुटपाथ को चलो इतना

यहाँ पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं

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जो दिख रहा उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शायरी है

जो कह सका था वो कह चुका हूँ जो रह गया है वो शायरी है

चित्र शायरी 1

जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे जब अपनी अपनी मोहब्बतों के अज़ाब झेले तो लोग समझे वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे उस एक कच्ची सी उम्र वाली के फ़ल्सफ़े को कोई न समझा जब उस के कमरे से लाश निकली ख़ुतूत निकले तो लोग समझे वो ख़्वाब थे ही चम्बेलियों से सो सब ने हाकिम की कर ली बैअत फिर इक चम्बेली की ओट में से जो साँप निकले तो लोग समझे वो गाँव का इक ज़ईफ़ दहक़ाँ सड़क के बनने पे क्यूँ ख़फ़ा था जब उन के बच्चे जो शहर जाकर कभी न लौटे तो लोग समझे

 

वीडियो 5

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
kaali raat ke sehraon me noor se para likha tha

Salman Ahmad's poetry is the assimiliation of various shades of life. The griefness of the deteriorated human values has never been penned so beautifully ever. This Pakistani poet who has spent a long part of his life in Canada can be seen reciting his ghazals for Rekhta Studio at India Islamic Cultural Centre. अहमद सलमान

काली रात के सहराओं में नूर-सिपारा लिक्खा था

अहमद सलमान

जो दिख रहा उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शाइरी है

अहमद सलमान

जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे

अहमद सलमान

शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो

अहमद सलमान

ऑडियो 3

जो दिख रहा उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शाइरी है

जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे

शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

 

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