असलम इमादी

ग़ज़ल 8

नज़्म 7

अशआर 7

हज़ार रास्ते बदले हज़ार स्वाँग रचे

मगर है रक़्स में सर पर इक आसमान वही

तुम मिरे कमरे के अंदर झाँकने आए हो क्यूँ

सो रहा हूँ चैन से हूँ ठीक है सब ठीक है

हम भी 'असलम' इसी गुमान में हैं

हम ने भी कोई ज़िंदगी जी थी

तुम्हारे दर्द से जागे तो उन की क़द्र खुली

वगरना पहले भी अपने थे जिस्म-ओ-जान वही

हवाएँ शहर की आलूदा-ए-कसाफ़त हैं

ये साफ़-सुथरा-पन और ये नफ़ासतें झूटी

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पुस्तकें 9

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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