अतहर राज़

ग़ज़ल 3

 

नज़्म 1

 

अशआर 3

हम गर्दिश-ए-गिर्दाब-ए-अलम से नहीं डरते

तूफ़ाँ है अगर आज किनारा भी तो होगा

यूँ तसव्वुर में दबे पाँव तिरी याद आई

जिस तरह शाम की बाँहों में सितारे आए

गिरती हुई दीवार का साया था तिरा साथ

फिर भी तिरी बाहोँ से जुदा थे तो हमीं थे

 

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए