ग़ज़ल 28

नज़्म 1

 

शेर 16

हम तो तमाम उम्र तिरी ही अदा रहे

ये क्या हुआ कि फिर भी हमीं बेवफ़ा रहे

हम से कोई तअल्लुक़-ए-ख़ातिर तो है उसे

वो यार बा-वफ़ा सही बेवफ़ा तो है

दिल की क़ीमत तो मोहब्बत के सिवा कुछ भी थी

जो मिले सूरत-ए-ज़ेबा के ख़रीदार मिले

पुस्तकें 1

Pas-e-Aaina

 

1984

 

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