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नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
किस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोर
यक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
मशवरा
अता-ए-ख़िलअत-ए-अह्मर उसे ख़ुद-सर बना देगी
वहाँ अपनी मोहब्बत का जो नादिर ताज पहनाया
सफ़ीया चौधरी
ग़ज़ल
दश्त की आब-ओ-हवा ने दिया काँटों का लिबास
मैं बहारों में जो पलता गुल-ए-अह्मर होता
हैदर अली जाफ़री
ग़ज़ल
भूलने वाले फ़क़त इतना बताना है तुझे
तेरा 'अह्मर' याद से तेरी कभी ग़ाफ़िल नहीं
अनवारुल हक़ अहमर लखनवी
ग़ज़ल
याँ बादा-ए-अहमर के छलकते हैं जो साग़र
ऐ पीर-ए-मुग़ाँ देख कि है सारी दुकाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
कहते हैं वो पाँ-ख़ुर्दा-लब याक़ूत के टुकड़े तो थे
कहलाए लेकिन आज से बर्ग-ए-गुल-ए-अह्मर भी हम
शाह नसीर
नज़्म
सुख़न दरमाँदा है
लहू मअनी नहीं देता
तो फिर क़िर्तास-ए-अह्मर हो कि अब्यज़ रंग-ए-पैराहन से














