aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "jaiphal"
असर लखनवी
1885 - 1967
शायर
मंज़र लखनवी
died.1965
जाफ़र अली हसरत
1734 - 1792
जाफ़र अब्बास
1947 - 2022
जाफ़र मलीहाबादी
born.1946
लेखक
जाफ़र ताहिर
1917 - 1977
हयात लखनवी
1931 - 2006
जाफ़र शिराज़ी
born.1920
जाफ़र ज़टल्ली
1659 - 1713
जाफ़र साहनी
1941 - 2018
औज लखनवी
1853 - 1917
सय्यदा जाफ़र
1934 - 2016
जाफ़र रज़ा
1939 - 2022
सय्यद जाफ़र अमीर
डॉ. जाफ़र अस्करी
born.1972
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगरजंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तिरा
तू जीवन की भरी गलीमैं जंगल का रस्ता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों मेंमैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
की मिरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबाहाए उस ज़ूद-पशेमाँ का पशेमाँ होना
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल मेंतुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
मोहब्बत के क़िस्से और महबूब के क़सीदे उर्दू शायरी में जितने आ’म हैं उतनी ही शोहरत महबूब की ज़ुल्म करने की आदत की भी है। आशिक़ दिल के हाथों मजबूर वह दीवाना होता है जो तमामतर जफ़ाओं और यातनाओं के बावजूद मोहब्बत से किनारा करने को तैयार नहीं। इन जफ़ाओं का तिलिस्म शायरों के सर चढ़ कर बोलता रहा है। जफ़ा शायरी के इसी रंग रूप से आशनाई कराने के लिए पेश है यह इन्तिख़ाबः
जंगलجَن٘گل
जल शून्य भूमि। रेगिस्तान।
जफ़ाईجَفائی
رک : جفا.
जफ़ाجَفا
अत्याचार, अन्याय, अनीति, सितम, ज़ुल्म, ज़्यादती
कैफ़ाکَیفَ
कैसा, क्योंकर, किस तरह
Lucknow Ka Dastarkhwan
मिर्ज़ा जाफ़र हुसैन
दस्तरख़्वान
Mafateeh-ul-Ghaib
इमाम जाफ़र सादिक़
Bahr-ul-Maani
मोहम्मद बिन नसरुद्दीन जाफ़र मक्की हुसैनी
पत्र
Zatal Nama
शहर आशोब, हज्व, ज़टल नामा
Urdu Mazmoon Ka Irtiqa
आलोचना
Imam Jafar Sadiq aur scienci Inkishafat
सय्यद मोहम्मद अली
Jul 2000विज्ञान
Tareekh-e-Adab-e-Urdu 1700 Tak
साहित्य का इतिहास
Asri Afsane Ka Fan
मेहदी जाफ़र
अफ़साना तन्क़ीद
Qadeem Lucknow Ki Akhiri Bahar
इतिहास
Daurta Jangal
सिराज अनवर
नॉवेल / उपन्यास
Islam Aur Mauseeqi
शाह मोहम्मद जाफ़र फुलवारवी
समा और अन्य शब्दावलियाँ
Tarjuma-e-Tareekh-e-Tabri
अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर अत्तबरी
इस्लामिक इतिहास
Makhdoom Mohiuddin
जीवनी
Tafseer Ibn-e-Jareer
इस्लामियात
Allama Iqbal Aur Maulana Zafar Ali Khan
जाफ़र बलूच
मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगामिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है
हज़रत इमाम-अली-'नक़ी' के पोतेसय्यद-'जाफ़र' सानी के पोते
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दोख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
धूप ही धूप हूँ मैं टूट के बरसो मुझ परइस क़दर बरसो मिरी रूह में जल-थल कर दो
अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाहइस क़दर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना
पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थेमैं जंगल में पानी लाया करता था
वो सुन्नी बच्चा कौन था जिस की जफ़ा ने 'जौन'शीआ' बना दिया हमें शीआ' किए बग़ैर
उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा होहर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो
कुछ जगमग जुगनू जंगल सेकुछ झूमते हाथी बादल से
शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरानमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते
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