न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में आत्म-चिंतन की बात है। अपनी ही स्थिति से अनजान व्यक्ति अक्सर दूसरों की कमियाँ खोजता और उनके गुण गिनता रहता है। लेकिन जैसे ही वह अपनी कमज़ोरियों को देखता है, उसके भीतर विनम्रता आती है और निर्णय करने की कठोरता घट जाती है। तब उसकी दृष्टि अधिक करुण और समझदार हो जाती है।
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टैग्ज़ : प्रेरणादायकऔर 1 अन्य
शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए
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Rekhta AI
मीर तक़ी मीर कहते हैं कि हर काम की असली शर्त शिष्टता और समझदारी है। अगर कमी बताने का ढंग सही न हो, तो बात सुधार की जगह चोट बन जाती है। इसलिए आलोचना भी एक तरह की कला है, जिसमें नरमी, समय और सही शब्दों का ध्यान चाहिए।
हमारे ऐब ने बे-ऐब कर दिया हम को
यही हुनर है कि कोई हुनर नहीं आता
हुस्न ये है कि दिलरुबा हो तुम
ऐब ये है कि बेवफ़ा हो तुम
दोस्त हर ऐब छुपा लेते हैं
कोई दुश्मन भी तिरा है कि नहीं
सब की तरह तू ने भी मिरे ऐब निकाले
तू ने भी ख़ुदाया मिरी निय्यत नहीं देखी
ख़ुश-नसीबी में है यही इक ऐब
बद-नसीबों के घर नहीं आती
मैं उस के ऐब उस को बताता भी किस तरह
वो शख़्स आज तक मुझे तन्हा नहीं मिला
हम को आपस में मोहब्बत नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में
किसी के ऐब छुपाना सवाब है लेकिन
कभी कभी कोई पर्दा उठाना पड़ता है
इक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा 'फ़राग़'
जब ख़ुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा
सच है इस एक पर्दे में छुपते हैं लाख ऐब
यानी जनाब-ए-शैख़ की दाढ़ी दराज़ है
हमारे ऐब में जिस से मदद मिले हम को
हमें है आज कल ऐसे किसी हुनर की तलाश
तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया
जो ऐब था उसे भी हुनर कह दिया गया
'क़ाएम' मैं इख़्तियार किया शाइ'री का ऐब
पहुँचा न कोई शख़्स जब अपने हुनर तलक
बहुत मिलने से ऐब दिखते हैं कम-कम
बहुत देखते हैं जो कम देखते हैं
पास था ज़र तो कोई ऐब न था
सब उयूब आए बे-ज़री के साथ
कहीं पे नक़्स मिले और कोई बात बने
वो ढूँडते हैं मिरे सूद में ज़ियाँ सा कुछ