२० मशहूर दिल शायरी
दिल शायरी के इस इन्तिख़ाब
को पढ़ते हुए आप अपने दिल की हालतों, कैफ़ियतों और सूरतों से गुज़़रेंगे और हैरान होंगे कि किस तरह किसी दूसरे, तीसरे आदमी का ये बयान दर-अस्ल आप के अपने दिल की हालत का बयान है। इस बयान में दिल की आरज़ुएँ हैं, उमंगें हैं, हौसले हैं, दिल की गहराइयों में जम जाने वाली उदासियाँ हैं, महरूमियाँ हैं, दिल की तबाह-हाली है, वस्ल की आस है, हिज्र का दुख है।
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तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता
Interpretation:
Rekhta AI
दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।
Interpretation:
Rekhta AI
दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।
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टैग: दिल
अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे
Interpretation:
Rekhta AI
यह शे’र मन और भावना के बीच संतुलन की बात करता है। बुद्धि को पहरेदार मानकर कहा गया है कि वह हृदय को गलतियों से बचा सकती है, लेकिन हर समय का ज्यादा सोच-विचार भावनाओं और हिम्मत को दबा देता है। इसलिए कभी-कभी अपने भीतर की सच्ची अनुभूति पर भरोसा करके हृदय को स्वतंत्र छोड़ना भी जरूरी है।
Interpretation:
Rekhta AI
यह शे’र मन और भावना के बीच संतुलन की बात करता है। बुद्धि को पहरेदार मानकर कहा गया है कि वह हृदय को गलतियों से बचा सकती है, लेकिन हर समय का ज्यादा सोच-विचार भावनाओं और हिम्मत को दबा देता है। इसलिए कभी-कभी अपने भीतर की सच्ची अनुभूति पर भरोसा करके हृदय को स्वतंत्र छोड़ना भी जरूरी है।
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया
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टैग: दिल
दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे
Interpretation:
Rekhta AI
दाग़ देहलवी ईश्वर से बाहरी सुख नहीं, बल्कि मन की बनावट की दुआ करते हैं। यहाँ “दिल” मन की हालत का प्रतीक है और “स्वभाव” उस शक्ति का, जो मुश्किल समय को भी सकारात्मक ढंग से सह ले। भाव यह है कि असली खुशी परिस्थितियों में नहीं, भीतर के संतोष और धैर्य में है। दुख की घड़ी में भी मुस्कराने की क्षमता ही सबसे बड़ी कृपा है।
Interpretation:
Rekhta AI
दाग़ देहलवी ईश्वर से बाहरी सुख नहीं, बल्कि मन की बनावट की दुआ करते हैं। यहाँ “दिल” मन की हालत का प्रतीक है और “स्वभाव” उस शक्ति का, जो मुश्किल समय को भी सकारात्मक ढंग से सह ले। भाव यह है कि असली खुशी परिस्थितियों में नहीं, भीतर के संतोष और धैर्य में है। दुख की घड़ी में भी मुस्कराने की क्षमता ही सबसे बड़ी कृपा है।
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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ प्रेम और दुख को “दिल का रोग” कहा गया है, जो इंसानी कोशिशों और इलाज—दोनों को बेकार कर देता है। “काम तमाम” से पूरी हार, टूटन और अंतिमता का भाव आता है, मानो बचने का कोई रास्ता नहीं रहा। मूल भाव बेबसी है: अंदर का दर्द ही सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है।
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ प्रेम और दुख को “दिल का रोग” कहा गया है, जो इंसानी कोशिशों और इलाज—दोनों को बेकार कर देता है। “काम तमाम” से पूरी हार, टूटन और अंतिमता का भाव आता है, मानो बचने का कोई रास्ता नहीं रहा। मूल भाव बेबसी है: अंदर का दर्द ही सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है।
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दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहते हैं कि दिल नाज़ुक होता है, यह ईंट-पत्थर की तरह बेजान नहीं है जिस पर चोट का असर न हो। जब दिल को दुःख होगा तो आँखों से आँसू बहेंगे ही, यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, इसलिए हमारे रोने पर किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए।
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहते हैं कि दिल नाज़ुक होता है, यह ईंट-पत्थर की तरह बेजान नहीं है जिस पर चोट का असर न हो। जब दिल को दुःख होगा तो आँखों से आँसू बहेंगे ही, यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, इसलिए हमारे रोने पर किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए।
शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
EXPLANATION #1
शाम होते ही मैं कुछ बुझा-बुझा और फीका-सा रहने लगता हूँ।
मेरा दिल गरीब के दीपक जैसा हो गया है, जो बस धीमा जलता है।
यहाँ शाम उदासी और अकेलेपन का संकेत बनती है, जिससे मन की रोशनी कम हो जाती है। दिल की तुलना “गरीब के दीपक” से है, जिसमें तेल कम होता है, इसलिए वह कांपती-सी, धुंधली रोशनी देता है और कभी भी बुझ सकता है। इस रूपक से टूटन, थकान और भीतर की कमी का दर्द सामने आता है।
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
EXPLANATION #1
शाम होते ही मैं कुछ बुझा-बुझा और फीका-सा रहने लगता हूँ।
मेरा दिल गरीब के दीपक जैसा हो गया है, जो बस धीमा जलता है।
यहाँ शाम उदासी और अकेलेपन का संकेत बनती है, जिससे मन की रोशनी कम हो जाती है। दिल की तुलना “गरीब के दीपक” से है, जिसमें तेल कम होता है, इसलिए वह कांपती-सी, धुंधली रोशनी देता है और कभी भी बुझ सकता है। इस रूपक से टूटन, थकान और भीतर की कमी का दर्द सामने आता है।
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।
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दिल दिया जिस ने किसी को वो हुआ साहिब-ए-दिल
हाथ आ जाती है खो देने से दौलत दिल की
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टैग: दिल