Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

२० मशहूर दिल शायरी

दिल शायरी के इस इन्तिख़ाब

को पढ़ते हुए आप अपने दिल की हालतों, कैफ़ियतों और सूरतों से गुज़़रेंगे और हैरान होंगे कि किस तरह किसी दूसरे, तीसरे आदमी का ये बयान दर-अस्ल आप के अपने दिल की हालत का बयान है। इस बयान में दिल की आरज़ुएँ हैं, उमंगें हैं, हौसले हैं, दिल की गहराइयों में जम जाने वाली उदासियाँ हैं, महरूमियाँ हैं, दिल की तबाह-हाली है, वस्ल की आस है, हिज्र का दुख है।

टॉप 20 सीरीज़

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।

दाग़ देहलवी

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है

और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

अहमद फ़राज़

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल

लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र मन और भावना के बीच संतुलन की बात करता है। बुद्धि को पहरेदार मानकर कहा गया है कि वह हृदय को गलतियों से बचा सकती है, लेकिन हर समय का ज्यादा सोच-विचार भावनाओं और हिम्मत को दबा देता है। इसलिए कभी-कभी अपने भीतर की सच्ची अनुभूति पर भरोसा करके हृदय को स्वतंत्र छोड़ना भी जरूरी है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र मन और भावना के बीच संतुलन की बात करता है। बुद्धि को पहरेदार मानकर कहा गया है कि वह हृदय को गलतियों से बचा सकती है, लेकिन हर समय का ज्यादा सोच-विचार भावनाओं और हिम्मत को दबा देता है। इसलिए कभी-कभी अपने भीतर की सच्ची अनुभूति पर भरोसा करके हृदय को स्वतंत्र छोड़ना भी जरूरी है।

अल्लामा इक़बाल

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

जलील मानिकपूरी

हम ने सीने से लगाया दिल अपना बन सका

मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया

जिगर मुरादाबादी

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ईश्वर से बाहरी सुख नहीं, बल्कि मन की बनावट की दुआ करते हैं। यहाँ “दिल” मन की हालत का प्रतीक है और “स्वभाव” उस शक्ति का, जो मुश्किल समय को भी सकारात्मक ढंग से सह ले। भाव यह है कि असली खुशी परिस्थितियों में नहीं, भीतर के संतोष और धैर्य में है। दुख की घड़ी में भी मुस्कराने की क्षमता ही सबसे बड़ी कृपा है।

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ईश्वर से बाहरी सुख नहीं, बल्कि मन की बनावट की दुआ करते हैं। यहाँ “दिल” मन की हालत का प्रतीक है और “स्वभाव” उस शक्ति का, जो मुश्किल समय को भी सकारात्मक ढंग से सह ले। भाव यह है कि असली खुशी परिस्थितियों में नहीं, भीतर के संतोष और धैर्य में है। दुख की घड़ी में भी मुस्कराने की क्षमता ही सबसे बड़ी कृपा है।

दाग़ देहलवी

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ दवा ने काम किया

देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रेम और दुख को “दिल का रोग” कहा गया है, जो इंसानी कोशिशों और इलाज—दोनों को बेकार कर देता है। “काम तमाम” से पूरी हार, टूटन और अंतिमता का भाव आता है, मानो बचने का कोई रास्ता नहीं रहा। मूल भाव बेबसी है: अंदर का दर्द ही सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रेम और दुख को “दिल का रोग” कहा गया है, जो इंसानी कोशिशों और इलाज—दोनों को बेकार कर देता है। “काम तमाम” से पूरी हार, टूटन और अंतिमता का भाव आता है, मानो बचने का कोई रास्ता नहीं रहा। मूल भाव बेबसी है: अंदर का दर्द ही सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है।

मीर तक़ी मीर

दिल ही तो है संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर आए क्यूँ

रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहते हैं कि दिल नाज़ुक होता है, यह ईंट-पत्थर की तरह बेजान नहीं है जिस पर चोट का असर हो। जब दिल को दुःख होगा तो आँखों से आँसू बहेंगे ही, यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, इसलिए हमारे रोने पर किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहते हैं कि दिल नाज़ुक होता है, यह ईंट-पत्थर की तरह बेजान नहीं है जिस पर चोट का असर हो। जब दिल को दुःख होगा तो आँखों से आँसू बहेंगे ही, यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, इसलिए हमारे रोने पर किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए।

मिर्ज़ा ग़ालिब

शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ

दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का

EXPLANATION #1

शाम होते ही मैं कुछ बुझा-बुझा और फीका-सा रहने लगता हूँ।

मेरा दिल गरीब के दीपक जैसा हो गया है, जो बस धीमा जलता है।

यहाँ शाम उदासी और अकेलेपन का संकेत बनती है, जिससे मन की रोशनी कम हो जाती है। दिल की तुलना “गरीब के दीपक” से है, जिसमें तेल कम होता है, इसलिए वह कांपती-सी, धुंधली रोशनी देता है और कभी भी बुझ सकता है। इस रूपक से टूटन, थकान और भीतर की कमी का दर्द सामने आता है।

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

EXPLANATION #1

शाम होते ही मैं कुछ बुझा-बुझा और फीका-सा रहने लगता हूँ।

मेरा दिल गरीब के दीपक जैसा हो गया है, जो बस धीमा जलता है।

यहाँ शाम उदासी और अकेलेपन का संकेत बनती है, जिससे मन की रोशनी कम हो जाती है। दिल की तुलना “गरीब के दीपक” से है, जिसमें तेल कम होता है, इसलिए वह कांपती-सी, धुंधली रोशनी देता है और कभी भी बुझ सकता है। इस रूपक से टूटन, थकान और भीतर की कमी का दर्द सामने आता है।

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मीर तक़ी मीर

बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए

दिल को तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है

हैदर अली आतिश

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है

ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।

मीर तक़ी मीर

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई

लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया

अज्ञात

जो निगाह-ए-नाज़ का बिस्मिल नहीं

दिल नहीं वो दिल नहीं वो दिल नहीं

मुबारक अज़ीमाबादी

ग़म वो मय-ख़ाना कमी जिस में नहीं

दिल वो पैमाना है भरता ही नहीं

अज्ञात

दिल दिया जिस ने किसी को वो हुआ साहिब-ए-दिल

हाथ जाती है खो देने से दौलत दिल की

आसी ग़ाज़ीपुरी

सीने में इक खटक सी है और बस

हम नहीं जानते कि क्या है दिल

ऐश देहलवी
बोलिए