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निज़ाम रामपुरी

1819 - 1872 | रामपुर, भारत

दबिस्तान-ए-रामपुर के प्रमुख शायर, मिर्ज़ा ग़ालिब ने "मीर-ए-रामपुर" की उपाधि से संबोधित किया

दबिस्तान-ए-रामपुर के प्रमुख शायर, मिर्ज़ा ग़ालिब ने "मीर-ए-रामपुर" की उपाधि से संबोधित किया

निज़ाम रामपुरी

ग़ज़ल 53

अशआर 63

अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो

और ये भी देखते हैं कोई देखता न हो

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अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ

देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ

है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम

मैं ये क्यूँ पूछूँ कब मिलेंगे आप

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तेरे ही ग़म में मर गए सद-शुक्र

आख़िर इक दिन तो हम को मरना था

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अब तुम से क्या किसी से शिकायत नहीं मुझे

तुम क्या बदल गए कि ज़माना बदल गया

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पुस्तकें 5

 

चित्र शायरी 2

 

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