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इफ़्तिख़ार आरिफ़

1943 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

पाकिस्तान में अग्रणी शायरों में शामिल, अपनी सांस्कृतिक रूमानियत के लिए मशहूर।

पाकिस्तान में अग्रणी शायरों में शामिल, अपनी सांस्कृतिक रूमानियत के लिए मशहूर।

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ग़ज़ल 61

नज़्म 42

अशआर 105

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं

जान बहुत शर्मिंदा हैं

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दिल पागल है रोज़ नई नादानी करता है

आग में आग मिलाता है फिर पानी करता है

ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं

फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं

मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे

मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे

नअत 2

 

पुस्तकें 33

चित्र शायरी 8

 

वीडियो 21

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

इफ़्तिख़ार आरिफ़

इफ़्तिख़ार आरिफ़

इफ़्तिख़ार आरिफ़

इफ़्तिख़ार आरिफ़

Dil o nigaah ki duniya nai nai hui hai

इफ़्तिख़ार आरिफ़

Fikr-e-baland o tamasha kahaan se laye

इफ़्तिख़ार आरिफ़

Iftikhar Arif expressing his views on today's poetry and reciting his poetry

इफ़्तिख़ार आरिफ़

log pahchan nahin paaenge chehra apna

इफ़्तिख़ार आरिफ़

Mayaar-r-sharaf halka-e-arbaab-e-hunar mein

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अब भी तौहीन-ए-इताअत नहीं होगी हम से

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अभी कुछ दिन लगेंगे

अभी कुछ दिन लगेंगे इफ़्तिख़ार आरिफ़

उमीद-ओ-बीम के मेहवर से हट के देखते हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कूच

जिस रोज़ हमारा कूच होगा इफ़्तिख़ार आरिफ़

कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कोई जुनूँ कोई सौदा न सर में रक्खा जाए

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कोई मुज़्दा न बशारत न दुआ चाहती है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

खज़ाना-ए-ज़र-ओ-गौहर पे ख़ाक डाल के रख

इफ़्तिख़ार आरिफ़

बद-शुगूनी

अजब घड़ी थी इफ़्तिख़ार आरिफ़

बारहवाँ खिलाड़ी

ख़ुश-गवार मौसम में इफ़्तिख़ार आरिफ़

हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ऑडियो 94

उमीद-ओ-बीम के मेहवर से हट के देखते हैं

ग़म-ए-जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए

ग़ैरों से दाद-ए-जौर-ओ-जफ़ा ली गई तो क्या

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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