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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल 89
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अशआर 87
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
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कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए
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और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
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दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
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