ज़ुल्फ़ शायरी

शायरी में ज़ुल्फ़ का मौज़ू बहुत दराज़ रहा है। क्लासिकी शायरी में तो ज़ुल्फ़ के मौज़ू के तईं शायरों ने बे-पनाह दिल-चस्पी दिखाई है ये ज़ुल्फ़ कहीं रात की तवालत का बयानिया है तो कहीं उस की तारीकी का। और उसे ऐसी ऐसी नादिर तशबहों, इस्तिआरों और अलामतों के ज़रिये से बरता गया है कि पढ़ने वाला हैरान रह जाता है। शायरी का ये हिस्सा भी शोरा के बे-पनाह तख़य्युल की उम्दा मिसाल है।

पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह

ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँ

आरज़ू लखनवी

हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए

उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

whether me or you, or miir it may be

are prisoners of her tresses for eternity

whether me or you, or miir it may be

are prisoners of her tresses for eternity

मीर तक़ी मीर

अपने सर इक बला तो लेनी थी

मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है

जौन एलिया

किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी

झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी

आरज़ू लखनवी

कुछ बिखरी हुई यादों के क़िस्से भी बहुत थे

कुछ उस ने भी बालों को खुला छोड़ दिया था

मुनव्वर राना

नींद उस की है दिमाग़ उस का है रातें उस की हैं

तेरी ज़ुल्फ़ें जिस के बाज़ू पर परेशाँ हो गईं

मिर्ज़ा ग़ालिब

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना

तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है

असरार-उल-हक़ मजाज़

छेड़ती हैं कभी लब को कभी रुख़्सारों को

तुम ने ज़ुल्फ़ों को बहुत सर पे चढ़ा रक्खा है

ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी

जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे

तब मैं ने अपने दिल में लाखों ख़याल बाँधे

मोहम्मद रफ़ी सौदा

झटको ज़ुल्फ़ से पानी ये मोती टूट जाएँगे

तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा मगर दिल टूट जाएँगे

राजेन्द्र कृष्ण

ये उड़ी उड़ी सी रंगत ये खुले खुले से गेसू

तिरी सुब्ह कह रही है तिरी रात का फ़साना

एहसान दानिश

इजाज़त हो तो मैं तस्दीक़ कर लूँ तेरी ज़ुल्फ़ों से

सुना है ज़िंदगी इक ख़ूबसूरत दाम है साक़ी

अब्दुल हमीद अदम

जुनूँ फिर मिरे सर पर वही शामत आई

फिर फँसा ज़ुल्फ़ों में दिल फिर वही आफ़त आई

आसी ग़ाज़ीपुरी

ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर

एक नदी में कितने भँवर

जाँ निसार अख़्तर

देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में

फिर जब तलक जिया मैं परेशान ही रहा

रज़ा अज़ीमाबादी

आप की नाज़ुक कमर पर बोझ पड़ता है बहुत

बढ़ चले हैं हद से गेसू कुछ इन्हें कम कीजिए

हैदर अली आतिश

फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम

जब धूप में साया कोई सर पर मिलेगा

बशीर बद्र

हाथ टूटें मैं ने गर छेड़ी हों ज़ुल्फ़ें आप की

आप के सर की क़सम बाद-ए-सबा थी मैं था

मोमिन ख़ाँ मोमिन

अब्र में चाँद गर देखा हो

रुख़ पे ज़ुल्फ़ों को डाल कर देखो

जोश लखनवी

बिखरी हुई वो ज़ुल्फ़ इशारों में कह गई

मैं भी शरीक हूँ तिरे हाल-ए-तबाह में

जलील मानिकपूरी

देख लेते जो मिरे दिल की परेशानी को

आप बैठे हुए ज़ुल्फ़ें सँवारा करते

जलील मानिकपूरी

ये खुले खुले से गेसू इन्हें लाख तू सँवारे

मिरे हाथ से सँवरते तो कुछ और बात होती

आग़ा हश्र काश्मीरी

सरक कर गईं ज़ुल्फ़ें जो इन मख़मूर आँखों तक

मैं ये समझा कि मय-ख़ाने पे बदली छाई जाती है

नुशूर वाहिदी

ज़ाहिद ने मिरा हासिल-ए-ईमाँ नहीं देखा

रुख़ पर तिरी ज़ुल्फ़ों को परेशाँ नहीं देखा

the priest has seen my piety, he hasn't seen your grace

he has not seen your tresses strewn across your face

the priest has seen my piety, he hasn't seen your grace

he has not seen your tresses strewn across your face

असग़र गोंडवी

सुब्ह-दम ज़ुल्फ़ें यूँ बिखराइए

लोग धोका खा रहे हैं शाम का

शरर बलयवी

सब के जैसी बना ज़ुल्फ़ कि हम सादा-निगाह

तेरे धोके में किसी और के शाने लग जाएँ

फ़रहत एहसास

कभी खोले तो कभी ज़ुल्फ़ को बिखराए है

ज़िंदगी शाम है और शाम ढली जाए है

प्रेम वारबर्टनी

जो देखते तिरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम

असीर होने की आज़ाद आरज़ू करते

हैदर अली आतिश

मेरे जुनूँ को ज़ुल्फ़ के साए से दूर रख

रस्ते में छाँव पा के मुसाफ़िर ठहर जाए

फ़ानी बदायुनी

बाल अपने उस परी-रू ने सँवारे रात भर

साँप लोटे सैकड़ों दिल पर हमारे रात भर

लाला माधव राम जौहर

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में

लो आप अपने दाम में सय्याद गया

मोमिन ख़ाँ मोमिन

ये कह कर सितम-गर ने ज़ुल्फ़ों को झटका

बहुत दिन से दुनिया परेशाँ नहीं है

अज्ञात

मुँह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर गुलाल

होली की शाम ही तो सहर है बसंत की

लाला माधव राम जौहर

शुक्र है बाँध लिया अपने खुले बालों को

उस ने शीराज़ा-ए-आलम को बिखरने दिया

जलील मानिकपूरी

रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं

क़यामत है मुसाफ़िर रास्ता दिन को भटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ज़रा उन की शोख़ी तो देखना लिए ज़ुल्फ़-ए-ख़म-शुदा हाथ में

मेरे पास आए दबे दबे मुझे साँप कह के डरा दिया

नवाब सुल्तान जहाँ बेगम

तसव्वुर ज़ुल्फ़ का है और मैं हूँ

बला का सामना है और मैं हूँ

लाला माधव राम जौहर

किसी के हो रहो अच्छी नहीं ये आज़ादी

किसी की ज़ुल्फ़ से लाज़िम है सिलसिला दिल का

यगाना चंगेज़ी

कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए

लहू मिरे ही जिगर में था तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी

अहमद मुश्ताक़

अल्लाह-रे तेरे सिलसिला-ए-ज़ुल्फ़ की कशिश

जाता है जी उधर ही खिंचा काएनात का

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उन के गेसू सँवरते जाते हैं

हादसे हैं गुज़रते जाते हैं

महेश चंद्र नक़्श

बरसात का मज़ा तिरे गेसू दिखा गए

अक्स आसमान पर जो पड़ा अब्र छा गए

लाला माधव राम जौहर

ज़ुल्फ़ों में किया क़ैद अबरू से किया क़त्ल

तू ने तो कोई बात मानी मिरे दिल की

इमाम बख़्श नासिख़

उस के रुख़्सार पर कहाँ है ज़ुल्फ़

शोला-ए-हुस्न का धुआँ है ज़ुल्फ़

जोशिश अज़ीमाबादी

उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दीजूर की सूझी

अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी

जुरअत क़लंदर बख़्श

'हातिम' उस ज़ुल्फ़ की तरफ़ मत देख

जान कर क्यूँ बला में फँसता है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दुनिया की रविश देखी तिरी ज़ुल्फ़-ए-दोता में

बनती है ये मुश्किल से बिगड़ती है ज़रा में

अज़ीज़ हैदराबादी

अगर देखे तुम्हारी ज़ुल्फ़ ले डस

उलट जावे कलेजा नागनी का

आबरू शाह मुबारक

तिरी जो ज़ुल्फ़ का आया ख़याल आँखों में

वहीं खटकने लगा बाल बाल आँखों में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ग़म-ए-ज़माना तिरी ज़ुल्मतें ही क्या कम थीं

कि बढ़ चले हैं अब इन गेसुओं के भी साए

हफ़ीज़ होशियारपुरी