जुदाई पर शेर
इश्क़-ओ-मोहब्बत में फ़िराक़,
वियोग और जुदाई एक ऐसी कैफ़ियत है जिस में आशिक़-ओ-माशूक़ का चैन-ओ-सुकून छिन जाता है । उर्दू शाइरी के आशिक़-ओ-माशूक़ इस कैफ़ियत में हिज्र के ऐसे तजरबे से गुज़रते हैं, जिस का कोई अंजाम नज़र नहीं आता । बे-चैनी और बे-कली की निरंतरता उनकी क़िस्मत हो जाती है । क्लासिकी उर्दू शाइरी में इस तजरबे को ख़ूब बयान किया गया है । शाइरों ने अपने-अपने तजरबे के पेश-ए-नज़र इस विषय के नए-नए रंग तलाश किए हैं । यहाँ प्रस्तुत संकलन से आप को जुदाई के शेरी-इज़हार का अंदाज़ा होगा ।
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
-
टैग्ज़ : फ़ेमस शायरीऔर 1 अन्य
हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
आप के बा'द हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ
आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती
बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है
उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
गुज़र तो जाएगी तेरे बग़ैर भी लेकिन
बहुत उदास बहुत बे-क़रार गुज़रेगी
यूँ लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना
रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि दुख इतना बढ़ गया है कि रात भर चैन नहीं मिलता, बस रोना और भटकना रह जाता है। ‘रोज़गार’ को रोने से जोड़कर कवि दिखाता है कि यह दर्द अब रोज़ का काम बन गया है। भाव में अकेलापन, थकान और दुख के सामने हार-सी स्वीकृति है।
-
टैग्ज़ : गिर्या-ओ-ज़ारीऔर 1 अन्य
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं
थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब
Interpretation:
Rekhta AI
इस दोहे में प्रेम की बेचैनी दिखती है: पास होने पर भी मन बिछड़ने की आशंका से घिरा रहता है। मिलन का सुख डर को मिटा नहीं पाता, बल्कि डर और तेज हो जाता है। इसी कारण प्रिय के आने पर भी रात भर नींद नहीं आती।
ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में
ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ
महीने वस्ल के घड़ियों की सूरत उड़ते जाते हैं
मगर घड़ियाँ जुदाई की गुज़रती हैं महीनों में
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि प्रेम में समय का अनुभव बदल जाता है। साथ रहने पर समय तेज़ी से बीतता है, और दूरी में वही समय खिंचकर भारी हो जाता है। ‘महीने’ और ‘घड़ियाँ’ मन की हालत के रूपक हैं। भावनात्मक केंद्र तड़प है, जो विरह को लंबा और मिलन को छोटा बना देती है।
हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें
बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं
लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं
जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो
ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो
तो क्या सच-मुच जुदाई मुझ से कर ली
तो ख़ुद अपने को आधा कर लिया क्या
बिछड़ के तुझ से न देखा गया किसी का मिलाप
उड़ा दिए हैं परिंदे शजर पे बैठे हुए
मर जाता हूँ जब ये सोचता हूँ
मैं तेरे बग़ैर जी रहा हूँ
महसूस हो रहा है कि मैं ख़ुद सफ़र में हूँ
जिस दिन से रेल पर मैं तुझे छोड़ने गया
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा
कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा
उस से मिलने की ख़ुशी ब'अद में दुख देती है
जश्न के ब'अद का सन्नाटा बहुत खलता है
तुझ से बिछड़ूँ तो तिरी ज़ात का हिस्सा हो जाऊँ
जिस से मरता हूँ उसी ज़हर से अच्छा हो जाऊँ
उस मेहरबाँ नज़र की इनायत का शुक्रिया
तोहफ़ा दिया है ईद पे हम को जुदाई का
तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें
कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है
दो घड़ी उस से रहो दूर तो यूँ लगता है
जिस तरह साया-ए-दीवार से दीवार जुदा
इस जुदाई में तुम अंदर से बिखर जाओगे
किसी मा'ज़ूर को देखोगे तो याद आऊँगा
तुम नहीं पास कोई पास नहीं
अब मुझे ज़िंदगी की आस नहीं
दम-ए-रुख़्सत वो चुप रहे 'आबिद'
आँख में फैलता गया काजल
वो शख़्स जिस को दिल ओ जाँ से बढ़ के चाहा था
बिछड़ गया तो ब-ज़ाहिर कोई मलाल नहीं
किसू से दिल नहीं मिलता है या रब
हुआ था किस घड़ी उन से जुदा मैं
Interpretation:
Rekhta AI
यह दोहा-जैसा भाव बताता है कि बिछड़ने के बाद किसी और का साथ भी मन को नहीं भरता। “हे प्रभु” कहना असहायता और भाग्य के आगे झुकने का संकेत है। “किस पल” पूछकर वक्ता उसी निर्णायक क्षण को ढूँढ़ता है जहाँ सब छूट गया, इसलिए पछतावा और तड़प बढ़ जाती है। मूल भाव विरह, अकेलापन और अफसोस है।
पा कर भी तो नींद उड़ गई थी
खो कर भी तो रत-जगे मिले हैं
किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है
किसे बताएँ हमारा जो हाल हो गया है
वक़्त-ए-रुख़्सत तिरी आँखों का वो झुक सा जाना
इक मुसाफ़िर के लिए ज़ाद-ए-सफ़र है ऐ दोस्त
ज़िंदगी नाम है जुदाई का
आप आए तो मुझ को याद आया
क्यूँ बढ़ाते हो इख़्तिलात बहुत
हम को ताक़त नहीं जुदाई की
तुम्हारे हिज्र में क्यूँ ज़िंदगी न मुश्किल हो
तुम्हीं जिगर हो तुम्हीं जान हो तुम्हीं दिल हो
तिरी तलाश में निकले तो इतनी दूर गए
कि हम से तय न हुए फ़ासले जुदाई के
हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते
बिन तिरे चाँद सितारे नहीं देखे जाते
ये सच है उस से बिछड़ कर मुझे ज़माना हुआ
मगर वो लौटना चाहे तो फिर ज़माना भी क्या
अम्न था प्यार था मोहब्बत था
रंग था नूर था नवा था फ़िराक़
वो क्या गया कि हर इक शख़्स रह गया तन्हा
उसी के दम से थीं बाहम रिफाक़तें सारी
फ़ुर्क़त-ए-यार में इंसान हूँ मैं या कि सहाब
हर बरस आ के रुला जाती है बरसात मुझे
न बहलावा न समझौता जुदाई सी जुदाई है
'अदा' सोचो तो ख़ुशबू का सफ़र आसाँ नहीं होता
तू मेरे साथ नहीं है तो सोचता हूँ मैं
कि अब तो तुझ से बिछड़ने का कोई डर भी नहीं
मिरी बहार में आलम ख़िज़ाँ का रहता है
हुआ जो वस्ल तो खटका रहा जुदाई का