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मैकश अकबराबादी

1902 - 1991 | आगरा, भारत

मैकश अकबराबादी

ग़ज़ल 3

 

शेर 14

मिरे फ़ुसूँ ने दिखाई है तेरे रुख़ की सहर

मिरे जुनूँ ने बनाई है तेरे ज़ुल्फ़ की शाम

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तिरी ज़ुल्फ़ों को क्या सुलझाऊँ दोस्त

मिरी राहों में पेच-ओ-ख़म बहुत हैं

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आप की मेरी कहानी एक है

कहिए अब मैं क्या सुनाऊँ क्या सुनूँ

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पहुँच ही जाएगा ये हाथ तेरी ज़ुल्फ़ों तक

यूँही जुनूँ का अगर सिलसिला दराज़ रहा

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नहीं है दिल का सुकूँ क़िस्मत-ए-तमन्ना में

तुम्हें भी दिल की तमन्ना बना के देख लिया

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पुस्तकें 14

आगरा और आगरे वाले

 

2002

Agra Aur Agre Wale

 

2002

हर्फ़-ए-तमन्ना

 

1955

Hazrat Ghaus-ul-Aazam Sawaneh-o-Talimat

Ma Tazkira Farzand-e-Ghaus-ul-Aazam

 

Maikada

 

 

मय-ख़ाना

 

1974

मसाइल-ए-तसव्वुफ़

 

1974

Masail-e-Tasawwuf

 

2000

Masail-e-Tasawwuf

 

1974

Mohammad Ali Shah Maikash Akbarabadi : Hayat Aur Karname

 

2002

चित्र शायरी 1

थी जुनूँ-आमेज़ अपनी गुफ़्तुगू बात मतलब की भी लेकिन कह गए

 

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